एक आदमी प्लास्टिक की चादर में लिपटा हुआ था, उसके शरीर की रेखाएँ साफ़ दिखाई दे रही थीं, उसके हाथ-पैर गतिहीन थे। ज़ोरदार दबाव से उसे नशा सा महसूस हो रहा था। वह बस साँस ले पा रहा था। मुँह के बल लेटकर साँस लेना असहनीय होता जा रहा था। उसका पूरा शरीर लिपटा हुआ था, और उसकी संवेदनशीलता बढ़ती जा रही थी। मालकिन की उँगलियों के स्पर्श मात्र से ही वह सिहर उठता था। एक असहनीय बेचैनी उस पर छा गई। लेकिन...
अधिक..