वह धीरे-धीरे टाइप करता है। वह धीरे-धीरे बदलती परिस्थितियों को स्वीकार करने में समय लगाता है। "खासकर अधिकार, बुढ़ापा और धन-दौलत जैसी चीज़ों को।" वह कहता है, "मुझे अब किसी चीज़ की परवाह नहीं है।" इसी वजह से, उसे एहसास होता है कि उसने खुद को यकीन दिला लिया है कि "डरने की कोई बात नहीं है।" दूर से उसे सायरन की आवाज़ सुनाई देती है। वह उस आदमी की बातों पर भरोसा करते हुए इंतज़ार करता है। ...लेकिन जितना ज़्यादा वह सुनता है, आवाज़ उतनी ही बढ़ती जाती है। यह कचरा हर जगह है...
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